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कविता।       “विकास”

                        डॉ. सतीश “बब्बा”
आज के विकास से,
वह जमाना अच्छा था,
एक जोड़ी कपड़े में,
पूरा परिवार पहनता था!
एक जोड़ी जूते चमड़े के,
तेल में भिगोकर,
मुलायम करके,
पूरा परिवार पहनता था!
रिश्तेदारों से मिलने,
पैदल ही जाया करते थे,
होंठों पर असली,
मुस्कान सजाया करते थे!
अब तो खाकर,
रासायनिक खाद वाले अनाज,
न पौष्टिकता न स्वाद,
पेट भरते चाइनीज चाट!
शुगर, ब्लडप्रेशर,
हार्ट की बीमारी,
डाक्टर की भरते तिजोरी,
शुकून नहीं है, है बस मारामारी!

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