भगवान श्री कृष्ण ने अपने जीवन के प्रारंभ काल में केवल वंशी ही बजाई लेकिन उसके बाद का शेष जीवन ज्यादातर शंख बजाने में ही गुजारा। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि जीवन में धैर्य और सहनशीलता का अपना विशेष महत्व है।
भगवान कृष्ण का वंशीनाद मौन की तरफ संकेत करता है और शंखनाद विद्रोह की तरफ। विद्रोह अंधविश्वास के साथ, विद्रोह कुंठित परंपराओं के साथ, विद्रोह अत्याचारियों के खिलाफ, विद्रोह अन्यायियों और स्वार्थ में जकड़ी राजसत्ता के खिलाफ।
केवल वंशी बजती तो श्रीकृष्ण और उसके आसपास के लोग ही सुखी हो पाते लेकिन शंखनाद हुआ तो धर्म रक्षा के साथ – साथ समस्त जगत और प्राणी मात्र के सुख का द्वार खुल पाया।
कालिया नाग जीव की तृष्णा और वासना का प्रतीक है। माँ यमुना जीवन का तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण विवेक के प्रतीक हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि तृष्णा का भी जीवन में अपना महत्व होता है इसलिए उन्हें मारना उपाय नहीं अपितु मोड़ना एक मात्र उपाय है।
तृष्णा से कृष्णा, काम से राम और वासना से उपासना की ओर गति ही भगवान श्रीकृष्ण की कालिया नाग मान मर्दन लीला का संदेश है।
कभी शांतिदूत तो कभी क्रांतिदूत, कभी यशोदा तो कभी देवकी के पूत। कभी युद्ध का मैदान छोड़कर भागने का कृत्य , तो कभी सहस्र फन नाग के मस्तक पर नृत्य। जीवन को पूर्णता से जीने का नाम कृष्ण है। जीवन को समग्रता से स्वीकार किया श्री कृष्ण ने। परिस्थितियों से भागे नहीं उन्हें स्वीकार किया।
*श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ*
आदित्य नारायण
योग प्रशिक्षक/प्रधानाध्यापक
