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बशिष्ठ पाण्डेय
बस्ती।  जीवन में सदगुण से ही मिठास आती है। जिसके जीवन में मधुरता नही ईश्वर उसे प्रिय नही है। महादान और द्रव्यदान से भी मान दान श्रेष्ठ है। श्रीरामचरितमानस में महाकवि गोस्वामी तुलसीदासजी ने  भगवान श्री राम और जनकनन्दिनी सीता के विवाह का वर्णन बड़ी ही सुंदरता से किया है। इनका विवाह पूरी रामायण की सबसे महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि प्रकृति के नियंता को ज्ञात था कि जीवन में चौदह वर्ष का वनवास और रावण जैसे अहंकारी असुर का वध धैर्ये के वरण के बगैर संभव नहीं है। अतः श्रीराम-जानकी का विवाह मुख्य रूप से यह एक बड़े संघर्ष से पूर्व धैर्यवरण का  प्रसंग है। यह सद् विचार कथा व्यास आचार्य रामेश्वर नारायण ने बहादुरपुर विकास खण्ड के नारायणपुर बढईपुरवा गांव में 9 दिवसीय संगीतमयी श्रीराम कथा के पांचवे दिन व्यक्त किया।
महात्मा जी ने कथा को विस्तार देते हुये कहा कि श्रीराम का विवाह केवल एक दिव्य विवाह का नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन मूल्यों का संदेश देने वाला है। भगवान श्रीराम ने माता सीता के साथ विवाह के माध्यम से यह सिद्ध किया कि विवाह एक पवित्र संस्कार है, जिसमें प्रेम, सम्मान और कर्तव्य का समन्वय होता है।
श्रीराम, लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न के नामकरण, यज्ञ रक्षा हेतु विश्वामित्र के साथ वन गमन आदि प्रसंगो का विस्तार से वर्णन करते हुये महात्मा जी ने कहा कि विश्वामित्र के आग्रह पर दशरथ श्रीराम को भेजने के लिये तैयार नहीं हुये ‘‘ राम देत नहीं बनइ गुंसाई। देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउॅं निमिष एक माही।। किन्तु जब गुरू वशिष्ठ ने उन्हें समझाया कि सब मंगल होगा राम के जन्माक्षर बता रहे हैं कि इस वर्ष इन चारों कुमारों के विवाह का योग है तो यह सुनकर दशरथ हर्षित हो गये। दशरथ सद्गुरू के अधीन थे और गुरूदेव की आज्ञा को शिरोधार्य किया।
कथा प्रसंगो के क्रम में महात्मा जी ने कहा कि  विश्वामित्र के साथ श्रीराम लक्ष्मण चले। विश्वामित्र के गुणोें की चर्चा करते हुये महात्मा जी ने कहा कि विश्व जिसका मित्र है वही विश्वामित्र है। जगत मित्र बनोगे तो राम, लक्ष्मण तुम्हारे पीछे-पीछे आयेंगे। भगवान कहते हैं जब जीव मेरे दर्शन के लिये आता है तो मैं खड़ा होकर उसे दर्शन देता हूं। ईश्वर की दृष्टि तो जीव की ओर अखण्ड रूप से है, जीव ही ईश्वर की ओर दृष्टि नहीं करता है। राम जी सभी से प्रेम करते हैं। वे हमेशा धनुष वाण अपने साथ रखते हैं। धनुष ज्ञान का और वाण विवेक का स्वरूप है। ज्ञान और विवेक से सदा सज्जित रहो क्योंकि काम रूपी राक्षस न जाने कब विघ्न करने आ जाये। जिसकी आंखों में पाप है वही राक्षस है।
श्रीराम कथा में मुख्य यजमान रणजीत सिंह उर्फ पल्लू सिंह, लालजीत सिंह, सर्वजीत सिंह ने विधि विधान से कथा व्यास का पूजन अर्चन किया।  कथा स्थल पर संरक्षक आशीष सिंह , पवन कसौधन, मोहन्ती दूबे, राम बदन सिंह, दिलीप शर्मा, आशुतोष सिंह, परमहंस शुक्ला,  राजेश त्रिपाठी, नरेंद्र पाण्डेय, पवन कुमार उपाध्याय, रणजीत, हरिनारायण पाण्डेय, राधिका सिंह, मिथलेश सिंह, मंजू, मीरा, गीता देवी, लक्ष्मी सिंह के साथ ही अनेक श्रद्धालु भक्त उपस्थित रहे।

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