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बशिष्ठ पाण्डेय

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बस्ती । महान संत गाडगे बाबा  को उनके 69 वें पुण्य तिथि पर याद किया गया। शुक्रवार को महामानव राष्ट्रीय संत गाडगे एवं संत रविदास कल्याण मिशन के जिलाध्यक्ष बनवारीलाल कन्नौजिया के संयोजन में अनेक संगठनों, राजनीतिक दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओंने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर  योगदान पर चर्चा किया।
मिशन के अध्यक्ष बनवारीलाल कन्नौजिया  ने कहा कि आधुनिक भारत को जिन महापुरूषों पर गर्व होना चाहिए, उनमें राष्ट्रीय संत गाडगे बाबा  का नाम सर्वोपरि है। संत गाडगे महाराज कहते थे कि शिक्षा बड़ी चीज है। उनक कहना था कि ‘पैसे की तंगी हो तो खाने के बर्तन बेच दो, औरत के लिए कम दाम के कपड़े खरीदो, टूटे-फूटे मकान में रहो पर बच्चों को शिक्षा दिए बिना न रहो।’ संत गाडगे महाराज ने अंधविश्वास से बर्बाद हुए समाज को सार्वजनिक शिक्षा और ज्ञान प्रदान किया।
संरक्षक शिवराम कन्नौजिया, विश्राम राव, उमाशंकर गौतम, राजू कन्नौजिया, उदयभान, हीरालाल वरूण, बुद्धि प्रकाश, राम नरेन्द्र, आर.के. आनन्द, शिवपूजन, साधूशरन आर्य आदि  ने कहा कि मानवता के सच्चे हितैषी, सामाजिक समरसता के द्योतक यदि किसी को माना जाए तो वे थे संत गाडगे। बाबा गाडगे का जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के अंजनगांव सुरजी तालुका के शेड्गाओ ग्राम में एक धोबी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम देबूजी झिंगरजी जानोरकर था। वह एक घूमते फिरते सामाजिक शिक्षक थे। गाडगेबाबा सिर पर मिट्टी का कटोरा ढककर और पैरों में फटी हुई चप्पल पहनकर पैदल ही यात्रा किया करते थे। और यही उनकी पहचान थी।
रामशंकर निराला, राम निरंजन राना, जवाहरलाल, कमलेश सचान, राजेन्द्र कन्नौजिया, राधेश्याम, विजय कुमार कन्नौजिया, विजय कुमार, अनिल कुमार आदि  ने कहा कि गाडगेबाबा जब भी किसी गांव में प्रवेश करते, तो तुरंत ही गटर और रास्तों को साफ सफाई करने लगते। और जब उनका यह काम खत्म हो जाता खुद लोगों को गांव के साफ होने की बधाई भी देते थे। गांव के लोग गाडगे बाबा जो पैसे भी देते थे। बाबा उन पैसो का उपयोग निस्वार्थ भाव से सामाजिक विकास और समाज का शारीरिक विकास करने में लगाते थे। वह लोगों से मिले हुए पैसों से महाराज गांवों में स्कूल, धर्मशाला, अस्पताल और जानवरों के निवास स्थान बनवाते थे।
गाडगे बाबा गांवों की सफाई करने के बाद शाम में कीर्तन का आयोजन भी करते थे। वह कीर्तनों के माध्यम से जन-जन तक लोकोपकार और समाज कल्याण का प्रसार करते थे। बाबा अपने कीर्तनों के माध्यम से लोगों को अन्धविश्वास की भावनाओं के विरुद्ध शिक्षित करते थे।  गाडगेबाबा समाज में चल रही जातिभेद और रंगभेद की भावना को नहीं मानते थे। वे समाज में शराबबंदी करवाना चाहते थे।
गाडगे महाराज लोगो को कठिन परिश्रम, साधारण जीवन और परोपकार की भावना का पाठ पढ़ाते थे और हमेशा जरूरतमंदों की सहायता करने को कहते थे।  उन्होंने अपनी पत्नी और अपने बच्चों को भी इसी राह पर चलने को कहा। संत गाडगे महाराज लोगों को जानवरों पर अत्याचार करने से रोकते थे और और लोगों के इसके खिलाफ जागरूक भी करते थे।  गाडगे महाराज ने 20 दिसंबर 1956 अपना देह छोड़ दिया। लेकिन आज भी सबके दिलों में उनके विचार और आदर्श जिंदा हैं।
पुण्य तिथि पर संत गाडगे  को नमन् करने वालों में सीताराम, मूलचन्द, डा. विजय कुमार गौतम, धर्मेन्द्र, अशोक लाल, डा. राम प्रकाश सुमन, सीताराम भाष्कर, प्रशान्त कुमार भारती, अक्षय कुमार, जगदीश शर्मा, भोलेनाथ, रामचेत, प्रवीण कुमार, जियालाल कन्नौजिया, रविश्ंाकर, राजन कन्नौजिया, अनुराग आदि शामिल रहे।

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