ग़ज़ल
जो लम्हें गुज़रे हैँ उनका मुझे हिसाब न दे
हसीन खुशियों का मौक़ा है इज़तिराब न दे
जहाँ में रुतबा है माँ बाप का बहुत ऊंचा
कहें वो कुछ भी पलट के कभी जवाब न दे
निगाहे नाज़ का हर रोज़ जाम पीता हूँ
किसी भी क़िस्म की ऐ साकिया शराब न दे
वो जिससे खतरा हो किरदार के बिगड़ने का
खुदारा ऐसी कभी भी कोई किताब न दे
हर एक फूल चमन का अज़ीज़ है मुझको
ऐ बाग़बां तू मेरे हाथ में गुलाब न दे
भटक गये हैँ जो इंसा उन्हें हिदायत दे
ये इल्तेजा है मेरी उनको तू अज़ाब न दे
हमेशा ज़ाहिरो बातिन हो एक सा मेरा
तू मेरे चेहरे पे इसके लिए नक़ाब न दे
हसीं बहारों का मौसम है खुशनुमा मनज़र
समाअतों को सिसकता हुआ रबाब न दे
जो एहतजाज वतन के खिलाफ हो तारिक़
हमारे दिल में कभी ऐसा इंक़लाब न दे
असलम तारिक
