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बशिष्ठ पाण्डेय

बस्ती । पूजा में भाव का महत्व है। प्रभु भक्त के भाव को देखते हैं। यदि हम राम को पाना चाहते हैं तो वे हमें अनुराग से प्राप्त होंगे। श्रीरामकथा मनमोहक, भवभयतारक व मर्यादापूर्वक मानव जीवन जीने का प्रधान साधन है। श्रीराम बाल्यावस्था से ही बड़े ही तेजस्वी थे। वे बाललीला से वे सबको आनंदित करते रहते थे। यह सद् विचार कथा व्यास आचार्य रामेश्वर नारायण ने बहादुरपुर विकास खण्ड के नारायणपुर बढईपुरवा गांव में 9 दिवसीय संगीतमयी श्रीराम कथा के चौथे दिन व्यक्त किया।
महात्मा जी ने कहा कि रामजी का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इसके बाद गुरु आश्रम में उन्होंने अल्प समय में ही सभी कलाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उन्होंने नामकरण के बाद प्रभु के मनोहर बाल रूप का वर्णन किया। व्यास जी ने बताया कि प्रभु श्रीरामचन्द्र ने बाल क्रीड़ा की और समस्त नगर निवासियों को सुख दिया। कौशल्याजी कभी उन्हें गोद में लेकर हिलाती-डुलाती और कभी पालने में लिटाकर झुलाती थीं ।
प्रभु की बाल लीला का वर्णन करते हुए महात्मा जी ने कहा कि भगवान राम के जन्म के बाद पूरे अयोध्या में शहनाई की आवाज गूंज रही थी। श्री राम की बाल लीला संसार की सकारात्मक एवं सुखद आनन्दमयी लीला है। भगवान राम की बाल लीला में ही उनके साम्यवादी चिंतन तथा उनका क्रियात्मक रूप स्पष्ट होता है, जब वह दशरथ के आंगन में बिहार करते हैं और महाराज दशरथ उन्हें भोजन के लिए बुलाते हैं तो वह समता के पोषक होकर बाल शाखाओं के साथ खेलते है। भगवान राम के साम्यवादी व समतामूलक चिंतन स्पष्ट होता है। बाल काल में उनकी लीलाओं के दर्शन करने के लिए देवता भी तरसते थे। भगवान शिव खुद ही वीर हनुमान के साथ वेश बदलकर भगवान राम की बाल लीलाओं के दर्शन करने आए थे। श्रीराम की बाल लीला देखने के लिये भगवान शिव, काक भुसुण्डि के साथ ही अनेक देवी देवता, अध्योध्या धाम पहुंचे और इसका सुख प्राप्त किया। कथा स्थल पर झांकियों ने मन मोह लिया।
श्रीराम कथा में मुख्य यजमान रणजीत सिंह उर्फ पल्लू सिंह, लालजीत सिंह, सर्वजीत सिंह ने विधि विधान से कथा व्यास का पूजन अर्चन किया। कथा स्थल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक विभाग प्रचारक ऋषि, परमहंस शुक्ला, राजेश त्रिपाठी, नरेंद्र पाण्डेय, पवन कुमार उपाध्याय, हरिनारायण पाण्डेय, संरक्षक आशीष सिंह के साथ ही अनेक श्रद्धालु भक्त उपस्थित रहे।

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