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नई दिल्ली। महिला सुरक्षा को लेकर सवालों में घिरी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से लाया गया नया प्रस्ताव सवालों के घेरे में है। राजनीतिज्ञ ही नहीं विधि विशेषज्ञ भी सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि ममता सरकार ने मंगलवार को संशोधन कानून पारित कर दुष्कर्म के अपराध में फांसी की सजा का प्रविधान किया है जबकि एक जुलाई से पूरे देश में लागू हुए नये आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता में पहले से ही दुष्कर्म के जघन्य अपराध में फांसी की सजा है।

कानूनविदों का कहना है कि पश्चिम बंगाल सरकार को कानून में संशोधन के बजाए मौजूदा कानून को कड़ाई से लागू करने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि दुष्कर्म के सामान्य अपराध में फांसी की सजा देना बहुत गलत होगा और दुष्कर्म के जघन्य अपराध में पहले से यह सजा मौजूद है।

बीएनएस की धारा 66 कहती है कि अगर दुष्कर्म के बाद पीडि़ता की मौत हो जाती है अथवा वह मरणासन्न स्थिति यानी कोमा की स्थित में पहुंच जाती है तो दोषी को कम से कम 20 साल की सजा जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है होगी। उम्रकैद का मतलब जीवन रहने तक कैद से है। या फिर मृत्युदंड होगा।

ममता सरकार की मंशा पर स्पष्ट सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील महालक्ष्मी पवनी कहती हैं कि महिलाओं को सुरक्षा देने और अपराध की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री नाकाम रहीं और अब संशोधित कानून लाकर वह जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रही हैं क्योंकि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में तो पहले से ही दुष्कर्म के जघन्य अपराध में फांसी की सजा है।

वह कहते हैं कि अगर कोई 18 वर्ष का लड़का और 17 वर्ष की लड़की भाग कर शादी कर लें तो वह 18 साल का लड़का दुष्कर्मी है। ऐसे में अगर दुष्कर्म के मामले में इस तरह की सजा रखी जाएगी तो कोर्ट के पास विवेकाधिकार कहां रह जाएगा। क्योंकि जैसा ये मामला होगा कि टेक्निकल रेप था, वैसे रेप नहीं था।

उनका कहना है कि इस तरह के राजनैतिक संशोधनों का कोई यूज नहीं है। वास्तव में ध्यान कानून के अनुपालन पर होना चाहिए। इस बात पर होना चाहिए कि नये कानून में जल्दी जांच, जल्दी ट्रायल के लिए जो समय सीमा तय की गई है उसका सख्त अनुपालन कैसे हो और अगर उसका पालन नहीं होता है तो क्या परिणाम होगा।

परिणाम भी तय होना चाहिए सिर्फ कहने भर से नहीं होगा कि तारीख पर तारीख नहीं होगी यह देखा जाना चाहिए कि ये सुनिश्चित कैसे हो। हालांकि जस्टिस धींगरा भी मानते हैं कि कानून में संशोधन लाने का राज्य सरकार को अधिकार है।

कानून देखा जाए तो बीएनएस की धारा 66 कहती है कि अगर दुष्कर्म के बाद पीड़िता की मौत हो जाती है अथवा वह मरणासन्न स्थिति यानी कोमा की स्थित में पहुंच जाती है तो दोषी को कम से कम 20 साल की सजा जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है होगी। उम्र कैद का मतलब जीवन रहने तक कैद से है। या फिर मृत्युदंड होगा।

विधेयक में दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म के दोषी को आजीवन कारावास की सजा और उसे पेरोल की सुविधा नहीं देने की बात कही गई है। साथ ही दोषी के परिवार पर आर्थिक जुर्माना का भी प्रावधान है। दुष्कर्मियों को शरण देने या सहायता देने वालों के लिए भी तीन से पांच साल की कठोर कैद की सजा का प्रावधान भी है।

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